Tuesday, December 31, 2013

दोनो एक हैं

लघु कथा 

             दोनो एक हैं


                                                      पवित्रा अग्रवाल 

    
 नेता जी अपनी गाड़ी में बैठे ही थे कि पत्रकार ने रोका--"सर मुझे आप से दो मिनट बात करनी है।'
 'अरे अभी नहीं बाद में पूछना ।अभी मैं जल्दी में हूँ,मुझे एयर पोर्ट पहुँचना है ।'
 "सर कहीं बाहर जा रहे हैं ?'
 "गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने दिल्ली जा रहा हूँ।'
 "सर सिर्फ दो सवाल ।'
 "अच्छा सिर्फ दो, जल्दी से पूछो ।'
 "सर गणतंत्र दिवस क्यों मनाते हैं ?'
 नेता जी सिर खुजाते हुए झल्लाए --"यह भी कोई सवाल है ?'
 पी ए ने स्थिति भाँपते हुए बात संभाली --"आप पत्रकार लोग भी नेताओं को इतना बेवकूफ क्यों   समझते हैं ?...क्या नेता जी को यह भी नहीं पता होगा कि इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ   था...अब हटिए नेता जी को देर हो रही है ।'
 "बस आखिरी सवाल सर ...हमारा राष्ट्रीय गीत कौन सा है और उसे किसने लिखा था ?'
 नेता जी मन ही मन खुश हुए कि कितना आसान सवाल पूछा है बेवकूफ ने।वह पी. ए. को बोलने का  मौका दिए बिना बोले -- "क्यों बच्चों के से सवाल पूछ रहे हो,यह तो देश का बच्चा बच्चा जानता    होगा कि "जन गण मन' हमारा राष्ट्रीय गीत है और इसे रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था।'
 "सर यदि यह राष्ट्रीय गीत है तो फिर हमारा राष्ट्र गान कौन सा है ?'
  "दोनों एक ही हैं ' कहते हुए नेता जी ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और एअर पोर्ट की  तरफ रवाना हो गए ।'
       

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-पवित्रा अग्रवाल
 

Friday, December 6, 2013

पोल्यूशन चैक

लघु कथा
 
          पोल्यूशन चैक
 
                                                                पवित्रा अग्रवाल 

         

      अभय स्कूटर ले कर घर से बाहर निकला ही था कि ट्रेफिक पुलिस ने रोक लिया--"लाइसेन्स
दिखाइए।'
उसने जेब से निकाल कर लाइसेन्स दिखाया ।
"पौल्यूशन चैक सार्टिफिकेट दिखाइये ।'
"अभी वही बनवाने जा रहा था ।'
इंसपैक्टर के चेहरे पर मुस्कान आ गई --"इसका मतलब सार्टिफिकेट नहीं है ।'
"है साब पर अभी दो दिन पहले ही एक्सपायर हुआ है,मैं बाहर गया हुआ था... आज ही लौटा हूँ ।'
"इंसपैक्टर ने अर्थ भरी मुस्कान से कहा - "ठीक है बनवा लीजिएगा पर अभी तो चालान कटेगा ही...काट दूँ ?'
"रहने दीजिये न साब ,भले ही सार्टिफिकेट एक्सपायर हो गया है पर मेरी गाड़ी फिट है आप खुद देख लीजिए... इस से कोई प्रदूषण नहीं फैल रहा है ।'
तभी वहाँ से काला धुंआ उगलती एक मोटर साइकिल गुजर गई पर इंसपैक्टर पहले वाले का चालान काटने न काटने के बीच उलझा हुआ था।

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-पवित्रा अग्रवाल
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Saturday, November 2, 2013

भगवान सब देखता है


लघु कथा
                         
  भगवान सब देखता है                                                                        
                                                                        
                                                                              पवित्रा अग्रवाल
         मंदिर से लौट कर दादी ने बताया--"क्या कल युग आ गया है, चोर भगवान को भी नहीं  छोड़ते।'
        नन्हें राहुल ने पूछा - "क्या हुआ दादी ?'
       "बेटा रात को मंदिर में चोरी हो गई, भगवान के सारे गहने चले गए ।'
 ' चोरों को भी और कोई नहीं मिला,चोरी भी की तो भगवान के गहनों की...  बेवकूफ      कहीं के,अब तो वह जरूर पकड़े जाएगे ।'
     दादी  चौंकीं "वो कैसे  राहुल ?'
    'दादी, आप ही तो कहती हैं कि गलत काम नहीं करना चाहिए,भगवान सब देखता है,
    अपने गहने चोरी होते समय भगवान ने चोरों को नहीं देखा होगा क्या ?'
     ' हाँ बेटा भगवान सब देखता तो है पर वह   बोल तो नहीं सकता ।'

-पवित्रा अग्रवाल
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Thursday, October 3, 2013

जागरूकता

लघु कथा      
                     जागरूकता
                                
                                                               पवित्रा अग्रवाल      
         
 राम अम्मा कई दिन से पीछे पड़ी थी--"अम्मा एक छोटा टी.वी.दिलवा दो,पगार में से सौ रुपये हर  महीने कट कर लेना, बच्चियाँ बहुत पीछे पड़ रही हैं।'
  आखिर मैंने उसे एक ब्लैक एंड व्हाइट पोर्टेबिल टी.वी. दिलवा दिया।
 कुछ दिन बाद ही वह बोली -- "अम्मा,टी.वी.वापस नहीं हो सकता क्या ?'
" अब अचानक क्या हो गया, तब तो टी. वी के लिये पीछे पड़ी हुई थी ?'
 "क्या करूँ अम्मा टी.वी. देख कर तो बच्चियों का दिमाग खराब हो गया है, कहती हैं"--"छोटे बच्चों   से काम नहीं कराना चाहिए ,अब हम तेरे साथ काम पर नहीं जाएगे, हमें स्कूल जाना है।'
"अम्मा हम भी पढाना  चाहते है लेकिन  दोनो मिल कर डेढ़ हजार से ऊपर कमा लेती हैं , आप ही बोलो स्कूल को भेज दूँ तो कैसे गुजारा होगा ?'
पवित्रा अग्रवाल
   
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-पवित्रा अग्रवाल

Tuesday, September 3, 2013

प्राणी रक्षक

लघु कथा
                                     प्राणी रक्षक
                                                                                पवित्रा अग्रवाल
 सपेरा रामू लुटा पिटा सा घर पहुँचा ।उसे देखते ही उसका बेटा चहका - "अरे बाबा आज तो नाग पंचमी हैं खूब कमाई हुई होगी ...आज तो पेट भर अच्छा खाना मिलेगा न ?'
 सपेरा चुप रहा ।
 "बाबा आप चुप क्यों हैं ? ...साँप की पिटारी भी आपके हाथ में नहीं है,क्या हुआ बाबा ?'
 "आज का दिन बहुत खराब गया बेटा ।साँप की पिटारी प्राणी रक्षक समिति के सदस्यों ने छीन ली ।'
 "क्यों बाबा ....वो उसका क्या करेंगे ?'
 "वो सांपों को जंगल में ले जा कर छोड़ देंगे ।वो कह रहे थे हम अपने धंधे के लिये सांपों को कष्ट देते हैं, जो गलत है ।'
 "उनकी यह बात तो गलत है बाबा।आपने उनसे कहा नहीं कि जानवरों पर इतनी दया आती है तो बकरीद पर कटने वाले उन लाखों निरीह बकरों को कटने से रोक कर दिखायें जिन्हें उस दिन काटा जाता है ।...सांप तो फिर भी काट कर आदमी की जान ले लेता है पर ये बकरे तो ..।'
 "क्या कहता बेटा उन्हों ने कुछ बोलने ही नहीं दिया वो तो पुलिस बुलाने की धमकी दे रहे थे ।'

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Monday, August 5, 2013

दूरदर्शी

लघु कथा                         
                    दूरदर्शी  
                            पवित्रा अग्रवाल
   
     "सर इस बार अपने भव्य समारोह  के लिए आप किस उद्योगपति को बुला रहे हैं ?'
      "इस वर्ष किसी उद्योगपति को नहीं, सेंट मेरी स्कूल की प्रिन्सपल को बुलाने का इरादा  है ।'
      "क्यो सर हर वर्ष तो आप किसी ऐसे व्यक्ति को बुलाते थे जो अच्छा डोनेशन दे जाता था,इस बार   प्रिन्सपल को क्यों ?..वहाँ तो डोनेशन लेने की परम्परा है,देने की नहीं ।'
     "अरे हम भी तो डोनेशन न देने वालों में से हैं... अगले वर्ष अपने परिवार के एक बच्चे का  एडमीशन मुझे उन्हीं के स्कूल में कराना है,अब समझ में आया कुछ ?'
      "जी सर, समझ गया ।' 

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-पवित्रा अग्रवाल

Monday, July 1, 2013

झापड़


लघु कथा   
                                 
     झापड़                                                                                     
                                                                          पवित्रा अग्रवाल
 
      मैके आयी रंजना का अपनी भाभी चंदा से किसी बात पर झगड़ा हो गया।दोनो ने एक दूसरे को  खरी खोटी सुनाई । विधवा माँ ने दोनो को शान्त करने की कई बार कोशिश की किन्तु दोनो ही उलझती रहीं ।''
        शाम को पति गिरीश के घर लौटने पर चंदा ने रो-रो कर उस से रंजना की शिकायत की।
गिरीश को बहुत गुस्सा आया -"अच्छा ,कहाँ है रंजना ...उसे यहाँ बुला कर ला ।''
    - "पर वह तो वापस चली गई ।'
      गुस्से में भुनभुनाता हुआ वह माँ के पास गया -"माँ तुम्हारे सामने, तुम्हारी बेटी ने चंदा को इतना उल्टा सीधा कहा... उस की इंसल्ट की और तुम चुपचाप देखती रहीं ?'
     -" तो मैं क्या करती ?''
 " भाभी से इस तरह बोलने की उस की हिम्मत कैसे हुई....तुमने उस को एक झापड़ क्यों नही मारा ?'
        "चंदा ने भी उस से कुछ कम नही कहा...फिर बेटी को ही झापड़ क्यों मारती ?'
        "घर में छोटे-बड़े का भी कुछ लिहाज करना चाहिए कि नहीं ? चंदा उसकी बड़ी भाभी है, कुछ कह भी दिया तो क्या लौट कर जवाब देना जरूरी था ?'
       "चंदा उस से बड़ी थी पर मैं तो शायद इस घर में तुम सब से छोटी  हूँ ...  तभी चंदा  की तरफ ले कर मुझ  से इस तरह बोल रहा है और अक्सर बोलता है,तेरी इस बद्तमीजी के लिये तुझे झापड़ मारने को किस से कहूँ ?...''

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-पवित्रा अग्रवाल
 

Thursday, June 6, 2013

जन्नत


लघु कथा   
 
                             जन्नत

                                                               पवित्रा अग्रवाल
 
 
 "सलीम भाई इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो ?'
 "साहब से छुट्टी लेने जा रहा हूँ।'
 "कोई खास बात ?'
 "हाँ अभी घर से फोन आया है,हमारी सास का इंतकाल हो गया है।'
 "बीमार थीं ?'
 "नहीं बीमार तो नहीं थीं,पेगनेन्ट थीं।बच्चा बच गया, सास की मौत हो गई।'
 "तुम्हारी बीबी भी पेगनेन्ट है न ?'
 "हाँ माँ-बेटी दोनो पेगनेन्ट थीं।'
 "तुम्हारी बीबी के कितने बहन-भाई हैं ?'
 "हमारी बीबी को मिला कर तेरह बहन भाई हैं ।हमारी बीबी सब से बड़ी है और अभी सब कुवाँरे   हैं।..अल्ला जाने उन बच्चों का क्या होगा अब ।'
 "मतलब ये चौदवाँ बच्चा पैदा हुआ है ?...इस जमाने में इतने साधन होते हुए भी ..
 "हाँ मैडम,हमारे ससुर बहुत पुराने ख्यालात के हैं,पिछली दो जच्चगी में भी हमारी सास बहुत मुश्किल  से बची थीं फिर भी उनको अक्ल नहीं आई,बोलते थे जच्चगी में मौत हुई तो सीधे जन्नत मिलेगी।'
 

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-पवित्रा अग्रवाल
 
 
 

Friday, May 3, 2013

हर्जाना

लघु कथा
       
                          हर्जाना



                                                                       पवित्रा अग्रवाल

 "सुनो अपनी  मुन्नी तो पहले से ही बहुत बीमार थी ...डाक्टर भी जवाब दे चुके  थे ।मर गई तो तुम ने   डाक्टरों से मार पीट क्यों की ?....अब चले गए न वो हड़ताल पर ।'
 "हमारी मुन्नी तो चली गई अब उनके हड़ताल पर जाने या न जाने से  हमें क्या फरक पड़ता है ?'
 "पर दूसरे मरीजों को फरक पड़ता है । इलाज न हो पाने से मरने वालों की संख्या कितनी बढ़ जाएगी  इसका तुम्हें अंदाजा है ?'
 "अरी चुप्प ,तूने दुनिया भर का ठेका ले रखा है क्या ?..डाक्टरों  पर लापरवाही का इल्जाम लगा के  मारपीट करने से हो सकता है हमें कुछ हर्जाना मिल जाए।''

                                                
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-पवित्रा अग्रवाल
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Saturday, April 6, 2013

अशुभ दिन

लघु कथा
                          अशुभ दिन

                                                             पवित्रा  अग्रवाल 

         ससुराल आई बहू ने सास से कहा ---" मम्मी जी अगले महीने की सात तारीख को गृह प्रवेश करने का प्रोग्राम है।आपको यह तारीख सूट तो करेगी न ?'
       "अरे बहू तुझे इतनी भी समझ नहीं है....अगले सप्ताह से पितृ पक्ष शुरू हो रहे हैं...उन दिनो गृह प्रवेश कैसे हो सकता है ?'

      "पर क्यों माँजी ?'
      "अरे यह श्राद्धों के दिन होते हैं...इन दिनों कोई शुभ काम नहीं किए जाते। ...अंग्रेजी पढ़ लिख कर तुम लोग भी अंग्रेज हो गए हो...भूल गए हो अपनी परम्पराओं को ।'
      सास की बात सुन कर बहू का मुँह ऐसे मुरझा गया जैसे बिना पानी के पौधे। दूसरे ही पल उसे याद आया कि उन्ही दिनो देवरानी भी माँ बनने वाली है।...वह मुस्कुरा कर देवरानी से बोली -- "मधु इन अशुभ दिनों में तुम को भी बच्चे को जन्म देने का शुभ काम नहीं करना चाहिए।'


   
     पवित्रा अग्रवाल

      http://bal-kishore.blogspot.com/
      http://laghu-katha.blogspot.com/



 

Sunday, March 17, 2013

कानून सब के लिए

लघु कथा
                   

                       कानून सब के लिए
                                                                           
                                                                        पवित्रा अग्रवाल
         
         सिटी मेयर की गाड़ी का चालान हो गया क्यों कि रेड लाइट होने पर भी उनकी गाड़ी सिगनल पर नहीं रुकी  थी।
         चालान काटने पर उनका ड्राइवर अकड़ता हुआ बोला -- "तुम्हे चालान काटना बहुत मंहगा पड़ेगा , जानते हो यह किस की गाड़ी है ?'
      "किसी की भी हो ,कानून सब के लिए एक है । अभी या बाद में तुम्हें सौ रुपए का जुर्माना तो भरना  ही पड़ेगा।'
      पीछे बैठे आदमी ने ड्राइवर को डाँटते हुए कहा --"ड्राइवर क्या बात है...एक तो तुमने रूल तोड़ा है ऊपर से मेरा नाम लेकर उसे धमका रहे हो ...तुम्ही लोग हमें बदनाम करते हो ...यह सौ रुपय अपनी जेब से तुम दो और आगे से इस तरह की गलती नहीं होनी चाहिये  ।'


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-पवित्रा अग्रवाल

Friday, February 8, 2013

लोकतंत्र

लघु कथा 
                   
                                  लोकतंत्र      
                                                   
                                                                             पवित्रा अग्रवाल     
             राज्य के सूखा प्रभावित क्षेत्र में सस्ती दरों पर पशु चारे का  वितरण समारोह हो रहा था।उस में जिला अधिकारी मुख्य अतिथि बन कर आए थे,भाषण के दौरान उन्होंने कहा
        --" सरकार राज्य में सूखे की स्थिति से वाकिफ है,आपकी सुविधा के लिए सरकार ने पचास प्रतिशत छूट देकर चारे की व्यवस्था की है, आप लोग उसका लाभ उठायें और पिचहत्तर रुपये क्विन्टल के भाव से चारा खरीदें।'
          सुनते ही किसानो में खुसर- पुसर चालू हो गई ।
          एक किसान खड़ा हो कर बोला --"ये कैसा सस्ता चारा है ?...,इस से कम भाव पर तो खुले बाजार में मिल रहा है ।'
            अधिकारी ने कहा--"यह कैसे हो सकता है,सरकार ने डेढ़ सौ रुपये  के हिसाब से खरीदा है और आपको आधी कीमत पर दिया जा रहा है।'
            दूसरे किसान ने कहा--" हम नहीं मानते.... कहीं कुछ घपला जरूर है।'
        फिर एक आवाज आई--"क्या आप बता सकते हैं सरकार ने यह चारा दुगनी कीमत में कहाँ से खरीदा है,क्या इसका बिल दिखा सकते हैं ?'
        सुनते ही अधिकारी अपना आपा खो बैठा और लात घूसे चलाते हुये चिल्लाया--"यू रास्कल ,बास्टर्ड तुम होते कौन हो हम से हिसाब पूछने वाले ?...लेना है तो चुपचाप लो वरना चले जाओ यहाँ से।'
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-पवित्रा अग्रवाल
  
    09393385447
 

Tuesday, January 1, 2013

उलाहना

लघु कथा 
                           
   उलाहना                                                                            
                                                                  पवित्रा  अग्रवाल
     
             आज सास बहू दोनो का उपवास था ।दोनो को दिन मे एक ही समय शाम को खाना था।बहू बाजार गई  हुई  थी और शाम तक नही लौटी थी।सासू जी को तेज भूख लगी थी।सोचा बना कर कुछ खा लूँ पर पल भर मे ही उन्हे एक वर्ष पूर्व की घटना याद आ गयी।
          उस दिन भी उन दोनो ने व्रत रखा था।बहू बाहर गई  हुई  थी।जब बहुत देर तक वह नही आई  तो उन्होने खाना बना कर खा लिया था।आते ही जब बहू को पता चला कि सास खाना खा चुकी हैं तो उसने बड़ी रुखाइ से कहा
--"मै तो आपकी वजह से जल्दी-जल्दी भाग कर आई  हूँ,आपने खाना खा भी लिया।मुझे पहले से पता होता तो मै मम्मी के घर से खा पी कर आराम से आती।...थोड़ी देर तो इंतजार कर लिया होता मम्मी जी ।'
             पिछली इस घटना का घ्यान आते ही सास ने बहू का इंतजार करना ही ठीक समझा।उन्हो ने खाने की सब तैयारी करली थी।सोचा था उसके आते ही पूड़ी-पराठे गरम बना लेंगे।बहू देर से ही नही काफी देर से आइ थी।चाहते हुये भी सास ने उलाहना नही दिया कि "आने मे इतनी देर क्यों कर दी ,बहुत देर से भूख लगी है'....क्यो कि वह जानती थीं  कि बहू के पास जवाबों का खजाना है।कोइ न कोइ कटु जवाब वह जरूर दे देगी और मै कइ दिन तक मन ही मन सुलगती रहूँगी।
   अत: उसने यथा सम्भव सहज दिखने का प्रयास करते हुये कहा   -"बहू पराठे बनाउँ या पूड़ी ?'
  बहू झल्लाये स्वर मे बोली --"क्या..... अभी तक आपने खाना नही खाया ?...एक दिन मै घर पर नही थी तो बना कर खा लेतीं न,इतनी देर तक इंतजार करने की क्या जरूरत थी।...मैं तो खा कर आइ हूँ।'
       सास असमंजस मे थी कि एक दिन जब खा लिया था तो सुन ने को मिला कि " अकेली खा कर बैठ गई  थोड़ा इंतजार नही कर सकती थीं।'...आज इंतजार कर रही हूँ तो भी उलाहना कि "बना कर खा लेती, इंतजार करने की क्या जरूरत थी।'
       सास कहना चाहती है कि " एक फोन ही कर दिया होता कि आप इंतजार मत करना, मैं खाकर आउँगी' किन्तु नही,कहने का कोइ फायदा नही।हर बात पर बहू का उलाहना सुनना अब शायद हर उस सास की नियति है जो बेटे- बहू पर आश्रित है।
     
   
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-पवित्रा अग्रवाल