Friday, December 4, 2015

छवि

लघु कथा           
                                        छवि                                                                                                                              पवित्रा अग्रवाल

             भारतीय संस्कृति में रची बसी ,विदुषी श्वेता बहन जी के सम्मान में एक  आयोजन रखा गया था .क्यों कि वह धार्मिक आयोजन था अतः श्रोता भी बहुत थे . संयोजक जी ने कहा बहन जी बस अभी आती ही होंगी .. .वह भारतीयता की बहुत बड़ी समर्थक हैं....वह अभी पश्चिमी देशों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर व्याख्यान दे कर लौटी हैं .आप में से बहुत लोगों ने उन्हें सुना भी होंगा ,बहुत अच्छा बोलती हैं .’
              तभी हाल में बाबकट बालों में जींस शर्ट पहने एक बेडौल सी महिला ने प्रवेश किया .
संयोजक जी ने उत्साहित होते हुए कहा –‘ इंतजार की घड़ियाँ समाप्त हुईं ,विदुषी श्वेता बहन जी पधार चुकी हैं...बहनजी आप सीधे मंच पर आजायें .
           उन्हें देख कर पीछे महिलाओं में फुसफुसाहट होने लगी...'अरे इन्हें भी लग गई हवा योरोपीय देशों की .’
            'हाँ यह तो पहचान में ही नहीं आ रहीं, एक बार बाहर जाते ही भारतीय वेषभूषा तो गायब ही हो गई .’
           ‘इस से पहले तो हमेशा उन्हें साड़ी पहने ही देखा था ,कभी सलवार सूट में भी नहीं देखा था .'
‘हाँ उनके भारी भरकम शरीर पर यह ड्रेस अच्छी भी नहीं लग रही...इस आयोजन में तो उन्हें भारतीय कपड़ों में ही आना चाहिये था .'     
‘आज कल अपनी बहु,बेटियां भी तो इस तरह के कपड़े पहनती हैं '
      ‘वह बात अलग है पर आज श्वेता जी का परिचय जिस रूप में दिया गया है उस छवि से उनकी वेष भूषा  मेल नहीं खा रही  ...क्या मैं गलत कह रही हूँ ?'
    'नहीं यह बात तो  आपने ठीक  कही है .'

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Sunday, November 8, 2015

लक्ष्मी


लघु कथा

                    लक्ष्मी

                                                         पवित्रा अग्रवाल

          दीपावली की शाम को फ्लैट से बाहर जाते हुए बेटे ने मम्मी से कहा --"अपन सब लोग घर से बाहर जा रहे हैं लौटते लौटते रात के ग्यारह बज सकते हैं,आप कहें तो खिड़कियाँ भी बन्द कर दूँ ?'
         "अरे नहीं,...कहा तो यह जाता है कि इस दिन घर  के खिड़की, दरवाजे सब खुले रखने चाहिए ताकि लक्ष्मी जी घर में प्रवेश कर सकें किन्तु आज के समय में ऐसा करने का मतलब है चोरों को दावत देना....पर खिड़की तो खुली छोड़ ही सकते हैं ।'
 "अरे मम्मी इस पटाखेबाजी के बीच खिड़कियाँ खुली रखना भी सुरक्षित नहीं है ।'
 "कुछ नहीं होता,तुम खिड़कियाँ बन्द नहीं करना ।'
 "ठीक है मम्मी मैं ने खिड़कियाँ खुली छोड़ दी हैं अब चलें ?'
   रात को ग्यारह बजे वे सब घर लौटे तो पता चला कि किसी जलते हुये राकेट से खिड़की के पर्दे में आग लग गई थी किन्तु पड़ौसियों की सतर्कता से तभी आग बुझा दी गई और एक बड़ा हादसा होते होते बच गया । 


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Thursday, October 1, 2015

आस- निराश

लघु कथा             

                 आस- निराश                                              
                                                पवित्रा अग्रवाल

       "सुनो तुम पूरी जिंदगी बेटा न होकर चार बेटियां होंने का गम पाले रहीं .तुम भाभी को बहुत भाग्यशाली मानती रहीं और वो खुद भी कि वह दो बेटों की माँ हैं .शायद वह तुम पर भी तरस खाकर पूरी जिंदगी अहसास दिलाती रहीं कि  तुझे चार बेटियां ही है .बेटियों को पढ़ाओ – लिखाओ फिर शादी में खूब खर्च करो पर शादी के बाद उन्हें तो दूसरे घर ही जाना है.बुढ़ापे में तो बेटा ही काम आता है .”
     “पर बात गलत भी तो नहीं  है ,आज हम बीमार हो जाएँ तो क्या बेटियां अपना घर ,अपनी जिम्मेदारियां छोड़ कर हमारे पास आकर रह सकती हैं ? सहारा तो बेटे का ही होता है .”
     “किस ज़माने में जी रही हो ? अपने आस पास नजर डालो तो पता चलेगा कि ज्यादातर बुजुर्ग अकेले ही रह रहे हैं.बड़ा शहर है,बड़ी बड़ी कंपनी यहाँ है पर बेटे या तो विदेश में है या फिर दूसरे शहर में रह रहे हैं  क्यों कि पत्नी सास ससुर के साथ नहीं, स्वतन्त्र रहना चाहती है .बेटे  चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे .”
     “जिठानी जी तो बहुत खुश हैं “
“ हाँ उनके बेटे पिता के साथ व्यापार में ही लगे हैं इस लिए बाहर न जा पाना उनकी मजबूरी है पर सुखी वे भी नहीं हैं.आज ही भैय्या बाजार में मिल गए थे ,बहुत उदास थे .दोनों बेटे शादी के बाद अलग रहने लगे हैं. भाभी तो पहले ही बीमार थीं , अब तो बिस्तर पकड़ लिया है ....हम भाग्य शाली हैं कि हमारे बेटियां ही हैं, तकलीफ में आकर देखलें तो बहुत अच्छा है न आ पाएं तो उतना दुःख नहीं होंगा .पर जिस पर आस लगा रखी हो वह साथ न दे तो आदमी लुटा सा महसूस करता है .


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-पवित्रा अग्रवाल




 

Friday, September 4, 2015

पर उपदेश

लघु कथा 

                       पर उपदेश

 
                                                 पवित्रा अग्रवाल

            पड़ौसी मूर्ति जी ने घर में प्रवेश करते हुए कहा--"नमस्ते शुक्ला जी ''
 "नमस्ते,नमस्ते मूर्ति जी,कहिये कैसे हैं ?''
 "अच्छा हूँ,उस दिन हिन्दी दिवस पर आपका लैक्चर बहुत अच्छा रहा , बैंक में सभी बहुत तारीफ कर रहे थे।आपकी एक बात तो मुझे बहुत अच्छी लगी कि हमे अपनी मात्र भाषा का पेपर भी घर में अवश्य लेना चाहिए ।मैं पहले केवल इंगलिश का पेपर ही लेता था, अब तेलगू का भी लेने लगा हूँ।...मुझे थोड़ी देर के लिए आपका हिन्दी पेपर चाहिए।''
     शुक्ला जी मन ही मन परेशान हो उठे।अब क्या करूँ ,हिन्दी का पेपर तो मैं लेता नहीं, इन्हें कहाँ से दूँ।...वह कोई उपयुक्त बहाना बना पाते उस से पहले ही उनका बेटा बोल पड़ा -- "अंकल हमारे यहाँ  हिन्दी का पेपर नहीं आता है ।'
    झेंपते हुए शुक्ला जी ने कहा -"असल में घर में कोई पढ़ता नहीं है और मैं कालेज में पढ़ लेता हूँ ।'
 "नो प्रोबलम शुक्ला जी मैं मार्केट से मंगा लूँगा ।'

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-पवित्रा अग्रवाल
 

Thursday, August 6, 2015

दो नुकसान

लघु कथा

                दो नुकसान                                                          
                                                     पवित्रा अग्रवाल 

   आते ही कामवाली मनोरमा  बोली ---    "अम्मा सरकार का दिमाग खराब हो गया है क्या ?''
 "क्या हुआ मनोरमा, बहुत परेशान दिख रही हो ?''
 "अरे अम्मा होना क्या है ?...आप को तो मालुम मेरे दोनो लड़के एक फैक्ट्री में काम करते हैं पर अब मालिक काम से हटाता बोलरा।''
 "क्यों ?''
 "बोलरा छोटे बच्चों से काम कराना अपराध है।जो लोग ऐसा करेंगे उन को पुलिस पकड़ लेगी,फिर उन्हें सजा भी हो सकती है ।''
 "हाँ सरकार बाल मजदूरी के खिलाफ कानून बनाया तो है । उनका कहना है कि कम मजदूरी दे कर बच्चों से बहुत काम लिया जाता हैं और उन्हें अभी पढ़ना चाहिए।''
 "ये बात तो ठीक है अम्मा बच्चों से बहुत काम कराते हैं और मजदूरी बड़ो से आधी भी नहीं देते.. उनकी पगार बढ़ाने को कानून बनाये ,काम के घन्टे तय कर दें पर ये तो काम ही नहीं कराना बोल रए.. इस से दो नुकसान हैं अम्मा।''
 "कौन से नुकसान हैं ?''
 'एक तो अम्मा बच्चे  जो पगार लाते हैं  वो बन्द हो जाएगी तो गुजारा कैसे होगा ?दूसरा बिना काम के वो करेंगे क्या ..इधर उधर आवारा घूमेंगे,जेब काटेंगे चोरी करेंगे या फिर किसी  गलत सोहबत में पड़ जायेंगे .'

पवित्रा अग्रवाल

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Wednesday, July 1, 2015

माध्यम

लघु कथा    

                                   माध्यम    
                                                      

                                                        पवित्रा अग्रवाल 

 प्रशासनिक अधिकारी सुभाष ने खिड़की के बाहर देखते हुए अपनी पत्नी से कहा--
 "स्मृति सुनो कुछ लोग गेट से अंदर आ रहे हैं,मुझे पूछें तो कह देना घर पर नहीं हैं।'
 "ठीक है '
 "हाँ कहिये...किस से मिलना है ?'
 "मैडम हम सुजाता स्कूल से आए हैं ।पुरस्कार वितरण सामारोह में मुख्य अतिथि बनाना चाहते हैं।'
 "लेकिन मेरे पति तो अभी घर पर नहीं हैं।'
 "हम आपको अतिथि बनाना चाहते हैं।'
 "अरे नहीं मुझे ऐसे प्रोग्रामों से क्या लेना देना।मैं तो एक घरेलू महिला हूँ।मेरे पति एक अधिकारी हैं  ,बनाना है तो उन्हें बनाऐ।'
 "हर कामयाब पति की सफलता के पीछे उसकी पत्नी का हाथ होता है।...आप अपने को कम मत   आँकिए ।हम सब आपको ही मुख्य अतिथि बनाने की इच्छा ले कर आये हैं।'
 "ठीक है मुझे तारीख  और समय बता दीजिये .  एक-दो दिन का  समय  भी  दें   यदि उस दिन मैं फ्री हुई तो आपको फोन पर स्वीकृति   दे दूँगी ।'
 "थैक्यू मैडम हम परसों इसी टाइम आपको फोन कर लेंगे।'- कह कर वह लोग चले गए ।
 पति ने राहत की साँस लेते हुए कहा--"स्मृति अच्छा किया तुम ने टाल दिया ,ये लोग मुझ से कुछ  कराना चाहते हैं...सही होता तो मैं वैसे  ही कर देता ....कई सिफारिशें आ चुकी हैं... .अब शायद  तुम्हें माध्यम बनाना चाहते हैं।'



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Monday, June 1, 2015

अच्छा किया

     
लघु कथा

                  अच्छा किया
                                                    
                                                                पवित्रा अग्रवाल
      
       बहुत दिनों  बाद एक अच्छी काम वाली पा कर तनाव मुक्त हो गई  थी।पर रोज सुबह आठ बजे तक आ जाने वाली लक्ष्मी दस बजे तक नहीं  आइ थी...मैने बर्तन मॉजना शुरू ही किया था कि सिर पर पट्टी बाँधे वह सामने खड़ी थी -- 
    -"हटो अम्मा हम साफ करते '
 "अरे ये क्या हुआ... कहीं गिर गई क्या ?'
   "नही अम्मा ..... रात में वो बच्चियों  का नान्ना ( पिता ) गाँव से आया,वोइच झगड़ा किया।'   
 "उसी ने मारा ?'
 "हौ अम्मा'
 "क्यों मारा ?'
   "अब क्या बोलूं अम्मा। एक छोटी सी कोठरी मे हम लोगाँ रहते,बाजू मे दो जवान बेटियाँ सोतीं। उसको नजदीक नही आने दी ... तो बोत गुस्से मे आ गिया...बच्चियों की भी शरम नही किया, बोला- "बहनो के मरद से काम चल जाता हुँगा, अब अपने मरद की क्या जरूरत'...दिल तो किया अम्मा कि उसका मुँह नोच लूँ पर बच्चियो के कारण मुँह सिल ली। मेरे कु उसका आना जरा भी पसंद  नहीं ।'
    "लक्ष्मी तेरा मरद है, तुझ से शादी की है उसने.. तेरे पास नही आयेगा तो किस के पास जायेगा ?'
    "अरे अम्मा उसका चरित्तर आप को नहीं मालुम ,सारे ऐब हैं उसमें फिर  शादी का मतलब बस यहीच होता अम्मा...जोरू और बच्चो के लिये उसका कोई  फरज नही ? उसके लक्षन अच्छे होते तो हम गॉव से इस सहर मे काहे को आते। ...दो कोठरी का घर था, उसे भी बेच के खा गया। अम्मा दो औरत बच्ची हैं। इनका भी तो घर बसाना न।'
   "हाँ सो तो है...फिर क्या हुआ ?'
 सुबह होतेइच मेरे कू खीच के हमारी अक्का ( बहन ) के घर को लेके गया ...अक्का और उसके मरद को गलीच-गलीच बाताँ बोला और मेरे कू वहींच मारना चालू किया फिर हम और अक्का मिल के उसको चप्पल से मारे।....अम्मा पहली बार हम उस पर हाथ उठाये....पर क्या करते....?"
        तभी उसकी बेटी आगयी-"अम्मा यह काम तो तुझ को  बोत पहले करना था....आज तक वह हमारे या तेरे वास्ते क्या किया ? हम लोगाँ मेहनत से कमाते और वो जब भी आता मार पीट के पैसे छीन के ले जाता... ..तूने कुछ भी गलत नही किया..जो किया अच्छा किया।'    


पवित्रा अग्रवाल

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Saturday, May 9, 2015

डुकरिया

 

 
लघु कथा
 
                                  डुकरिया
                                      
                                                                             पवित्रा अग्रवाल

       ससुराल से पीहर आई बेटी से वहाँ के हाल चाल पूछते हुए माँ ने पूछा -- "तेरी डुकरिया के क्या   हाल हैं ?'
     "कौन डुकरिया माँ ?'
       "अरे वही तेरी सास ।'
 "प्लीज माँ उन्हें डुकरिया मत कहो ...अच्छा नहीं लगता ।'
 "मैं तो हमेशा ही ऐसे कहती हूँ, इस से पहले तो तुझे कभी बुरा नहीं लगा...अब क्या हो गया ?'
 "इस डुकरिया शब्द की चुभन  का अहसास मुझे तब हुआ जब एक बार अपनी सास को भी आपके   लिए इसी शब्द का स्तमाल करते सुना था...यद्यपि उन्हों ने मेरे सामने नहीं कहा था।'              

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-पवित्रा अग्रवाल
  
 
 
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Thursday, April 9, 2015

जो राम रचि राखा

लघु कथा
                     जो राम रचि राखा
 
                                                    
                                                                            पवित्रा अग्रवाल

 "बेटा यह शादी नहीं हो सकती ।'
 "क्यों पापा ? वह हमारी जाति की नहीं है,इस लिए ?'
 "एक कारण यह भी हो सकता था पर तुम्हारी खुशी के लिए हम इस शादी के लिए तैयार हो गए थे। पर तुम दोनो की जन्म पत्री नहीं मिल रही है।पंडित जी ने कहा है कि लड़की के भाग्य में वैधव्य का योग है... इसलिए उन्होंने इस विवाह से इंकार कर दिया है और यह बात सुन कर  हम भी हाँ कैसे  कर सकते ?'
 "पापा हमारा पढ़ा लिखा परिवार है... इन दकियानूसी बातों पर आप विश्वास  करते हैं ?
 "हाँ बेटा इस में तो हम विश्वास  करते हैं।'
 पापा यदि ये पंडित ऐसे किस्मत पढ़ सकते तो इनके परिवार में   कोई बेटी या बहू विधवा नहीं होती। ...  आपको तो पता है न कि पिछले वर्ष ही इन पंडित जी की बेटी शादी के एक साल बाद ही विधवा हो गई थी।क्या इन्होंने कुंडली नहीं मिलाई होगी ?'
 "बेटा तू बहस बहुत करता है।'
 "पापा मैं बहस नहीं कर रहा, सच्चाई के उदाहरण दे कर आप को ऐसे बेतुके अंधविश्वासों  से बचाने की   कोशिश कर रहा हूँ। ...प्लीज पापा ।'
 "ठीक है बेटा दिल पर पत्थर रख कर स्वंय को यह कह कर समझा लेंगे कि होवत वही जो राम रचि राखा ।'
 " थैंक यू,यह हुई न मेरे पापा वाली बात '

-पवित्रा अग्रवाल

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Sunday, March 1, 2015

वाह देवी माँ

लघु कथा   
                      
    वाह देवी माँ 

                                                                पवित्रा अग्रवाल
     
         "मिसेज गुप्ता कुछ सुना आपने...मिसेज नन्दा बुरी तरह जल गई हैं, अस्पताल में हैं।'
      "ये क्या कह रही हैं आप ...अभी दो तीन घन्टे पहले ही तो मुझे मिली थीं ।उन्हें सुबह सुबह इतनी  जल्दी तैयार देख कर मैं ने पूछा था --"मिसेज नन्दा आज इतनी जल्दी तैयार हो गई हैं ,कहीं  जाना है क्या ?'
      कहने लगीं--"हाँ देवी माँ  के मंदिर में दीया जलाने जाना हैं।.. ड्राइवर का इंतजार कर रही हूँ ,उसे  जल्दी आने को कहा था पर वह अभी आया नहीं है।'
     "मैं ने पूछा भी था कि क्या कोई खास बात हैं ?'
       कहने लगी " मिसेज गुप्ता आपको  तो मालुम है संजू, रवीना को कितना चाहता था किन्तु रवीना के  पिता गैर बिरादरी में शादी करने को तैयार नहीं थे ।तभी मैंने अपने इकलौते बेटे की खुशी के लिये  मन्नत माँगी थी।अब मेरी मनोकामना पूरी हो चुकी है और दोनो हनीमून पर गए हुए हैं तो सोचा मैं  यह काम भी कर आऊँ ।'... तभी उनका ड्राइवर आ गया था और वह चली गई थीं ....'
       "वाह देवी माँ,मनौती पूरी करने के लिए आए अपने भक्त की यह दशा .... बहुत बुरा हुआ।कैसे हो  गया यह सब, ..बच तो  जायेंगी ?'
      " सुना है कि मंदिर में दिया जलाते समय उनके कपडों में आग लग गई थी।..उनके ड्राइवर ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया है, हालत नाजुक है।'
 
 
पवित्रा अग्रवाल
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Tuesday, February 3, 2015

मौहब्बत


लघु कथा   
                                                    
                       मौहब्बत 
 
                                                        पवित्रा अग्रवाल   
     
      सुनो शादी के सात सालों मे तुम पाँच बच्चो के अब्बा बन गये और छठे के बनने वाले हो। कुछ नही किया तो दस बारह बच्चो के अब्बा हो जाओगे।हाथ भी कितना तंग रहता है...तुम बोलो तो मै इस बार आप्रेशन करा लूँ ?'
   "नक्को कोइ जरूरत नही।अब्बा-अम्मी को मालुम हुआ तो फजीता करते।'
   "अपने अब्बा-अम्मी की फिकर है ,बच्चों की और मेरी नही....लगता तुम मुझ से अब पहले सी मौहब्बत नही करते।'
   "आप्रेशन का मौहब्बत से क्या रिश्ता है?
 "रिश्ता है, बहुत बड़ा रिश्ता है...तुमको मालुम न मेरी अम्मी की मौत कैसे हुइ थी?'
   " हौ,मालुम...जच्चगी के वखत हुइ थी।'
       "ये भूल गये कि पन्द्रहवी जच्चगी के वखत हुइ थी।...उनको भी अब्बा आप्रेशन नही कराने दिये थे।अम्मी तो अल्ला को प्यारी हो गयी।अब्बा दूसरी को घर ला लिये,वो तो अच्छा है उसको बच्चे नही हुये।अब्बा की सारी कमाइ इतने बड़े खानदान का पेट भरने मे ही चली जाती है ।अब तक बस मेरा निकाह कर पाये हैं दूसरी बहने निकाह के इंतजार मे घर बैठ कर बुड्ढ़ी हो रही हैं।भायाँ भी इघर उधर छोटे-छाटे कामा कर रऐ,एक पैट्रोल पम्प पे, एक पान के डब्बे पे,एक चाय की दुकान पे । बिना तालीम के ऐसे ही कामा करने पड़ते।सोहबत भी अच्छी नही है, परसो अजहर स्कूटर चोरी के इल्जाम मे पकड़ा गया।तुम चाहते कि हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो ? तुम काम पे चले जाते मै एसी हालत मे भी सिलाइ का काम करती तब भी हाथ तंग रहता।.... पता नही क्यो इस मरतबा मेरे को बहुत डर लगरा है...बुरे-बुरे ख्वावाँ आ रहे है....ऐसे वखत में  अम्मी की तरह मै भी अल्ला को प्यारी हो गइ तो ?'......बात करते हुये नजमा की आँखें भर आयी और वो खामोश हो गइ।
       " बस अब चुप कर...तू ठीक बोल रही है।इस जचगी के बखत डाक्टर को बोल के तेरा आप्रेशन करा देता।'
   "तुम सच बोल रए...फिर तुम्हारे अब्बा- अम्मी....?'
  "उनकी फिकर तू नक्को कर।'
       फिर वह शरारत से बोला - "जो बीबी को करते प्यार वह आप्रेशन से कैसे करे इनकार।'        
       

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-पवित्रा अग्रवाल
 
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Friday, January 2, 2015

दखल

 
लघुकथा

                           दखल     
                                                  पवित्रा अग्रवाल


 माँ ने बहू बेटे को तैयार हो कर बाहर जाते देख कर पूछा --"सुबह सुबह तुम दोनो कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ अस्पताल जा रहे हैं।'
 "क्यों,किस की तबियत खराब है ?'
 बेटे ने सकपकाते हुए कहा --"माँ आपकी बहू फिर माँ बनने वाली है।हम टैस्ट करा कर देखना चाहते हैं  कि गर्भ में लड़का है या लड़की ।'
 "क्या करोगे पता कर के ?'
 "करना क्या है माँ लड़की हुई तो सफाई करा देंगे।'
 "तू ये क्या कह रहा है ?...आज कल लड़कियां भी किसी से कम नहीं हैं ।'
 "हाँ माँ यह मैं जानता हूँ पर हमारे दो बेटियाँ तो हैं न।क्या आप नहीं चाहतीं कि हमारे एक बेटा भी हो ?  ....अब मैं इतना धन्ना सेठ तो हूँ नहीं कि तीन तीन बेटियों की अच्छी परवरिश कर सकूँ।...अपने यहाँ  लड़कियों की शादी में कितना दहेज चलता है क्या आप नहीं जानतीं ?...वैसे भी बाप दादों का दिया तो   मेरे पास कुछ है नहीं ?'
 मां ने दुखी स्वर में कहा --"तुम्हारी यह बात तो सही है बेटा कि हम जिन्दगी भर बस गुजारा ही कर  पाए, ...दो कमरे का एक मकान भी नहीं बना सके ,पर ...
 "पर वर कुछ नहीं माँ,मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन जिन्दगी के कुछ फैसले हम खुद लेना   चाहते हैं...प्लीज इसमें दखल मत दीजिए ।'
  कहते हुए दोनो घर से बाहर चले गए।


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