मोहभंग
लघुकथा
मोहभंग
पवित्रा अग्रवाल
मोहभंग
सुबह की सैर के समय दोस्त स्मिता ने पूछा --
‘पूनम ,आज अहोई आठें हैं ,तुमने तो व्रत रखा होगा ?’
‘नहीं स्मिता इस बार नहीं रखा .’
‘तुम तो हमेशा बड़ी श्रद्धा से यह व्रत रखती थीं ,इस बार क्यों नहीं ?’
'बस ऐसे ही ,अब भूखा नहीं रहा जाता ’
‘नहीं पूनम बात तो कुछ और है ,तू बहुत उदास भी दिख रही है ’
‘अब क्या बताऊँ, इन व्रत उपवासों से मोहभंग हो गया है .एक ही बेटा है जिस के जन्म लेने से पहले ही उसके पिता की मौत हो गई थी .माता पिता ने दूसरी शादी करने के लिए बहुत जोर डाला था पर बेटे के प्रति फर्ज और ममता ने कुछ नहीं सोचने दिया .आज वही बेटा दूर बहुत दूर अपने बीबी बच्चों के साथ अमेरिका जा बैठा है और कभी दिखाने को भी नहीं कहता कि अब आप को मेरे साथ रहना है ‘
‘पता नहीं बच्चे इतने संवेदनहीन और स्वार्थी कैसे हो जाते है’
‘अब तक तो माँ थी और नौकरी भी .अब न नौकरी रही न माँ .बहुत अकेली हूँ '

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