Friday, March 3, 2017

बैठी लक्ष्मी


लघु कथा
                        बैठी लक्ष्मी       
                                                          पवित्रा अग्रवाल


        रतन के घर में घुसते ही मनीषा ने कहा--" आज तुम ने लंच में आने में बहुत देर कर दी ।कुछ परेशान भी दिख रहे हो ।''
 "हाँ पुलिस स्टेशन से आ रहा हूँ ।'
 "क्यों,क्या हुआ ?'
 "बैंक से पचास हजार रुपए ले कर आ रहा था। मोटर साइकिल पर सवार दो लोगों ने किसी का  पता पूछा। मैं उनको बता ही रहा था कि वह मेरे हाथ से बैग छीन कर भाग गए ।स्कूटर नंबर मैंने देख लिया था ।पुलिस में रिपोर्ट लिखा कर आ रहा हूँ।'
   "अरे ऐसे लोग स्कूटर भी चोरी का ही स्तेमाल करते हैं।तुम तो इतने सावधान रहते हो...'
     "बस नुकसान होना था सो हो गया पर पचास हजार कोई छोटी रकम नहीं होती और इस समय तो पैसे की जरूरत भी बहुत थी।रत्ना का एम बी ए में एडमीशन कराना था ।'
   मनीषा को बैठी लक्ष्मी की याद आ गई,तीन चार महीने पहले की ही तो बात है। धनतेरस के दिन उसने पति से कहा था - "आज का दिन शुभ है,आज मैं चाँदी की बैठी हुई लक्ष्मी जी की मूर्ति खरीद कर लाऊँगी ।दीपावली के दिन अपने मंदिर में इसकी स्थापना कर के लक्ष्मी पूजन करेंगे ।'
    रतन ने टोका था--"अपने मंदिर में चाँदी की इतनी बड़ी लक्ष्मी जी हैं तो दूसरी क्यों ?'
   "हाँ हैं , पर वह खड़ी हुई लक्ष्मी की है ।उस दिन मिसेज चारु आई थीं,.. आपको तो मालुम है कि वह कितनी धनी हैं ।हमारे मंदिर को देखते ही बोलीं "अरे आपने मंदिर में खड़ी लक्ष्मी की मूर्ति क्यों  रख रखी है ? मूर्ति बैठी हुई लक्ष्मी की होनी चाहिए ।'
    मैंने  कहा--" मुझे तो यह सब पता नहीं था ।क्या इसका कुछ खास कारण है ?'
   वह बोलीं "लक्ष्मी जी बड़ी चंचल प्रवृत्ति की होती हैं, आराम से बैठी लक्ष्मी की तुलना में खड़ी लक्ष्मी के जल्दी चल देने की संभावना रहती है।मेरे घर में तो खड़ी लक्ष्मी की एक तस्वीर तक नहीं है ।'
     "अरे यार तुम भी कैसी कैसी बातों में विश्वास करने लगती हो ,ऐसे...
    "बस बस तुम मुझे कुछ मत समझाओ , मैं ने निर्णय कर लिया हैं कि बैठी हुई लक्ष्मी की मूर्ति लाऊँगी तो बस लाऊँगी ।'
   "ठीक है जरूर लाओ ।'
 और वह लाई थी ।अपने मंदिर में जा कर उसने देखा लक्ष्मी जी तो अभी भी मंदिर में बैठी हुई हैं पर... 


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Friday, February 17, 2017

भगवान सब देखता है




लघु कथा
 
    भगवान सब देखता है

                                         पवित्रा अग्रवाल
                                

     मंदिर से लौट कर दादी ने कहा --"क्या कल युग आ गया है, चोर भगवान को भी नहीं  छोड़ते।'
 नन्हें राहुल ने पूछा - "क्या हुआ दादी ?'
 "रात को मंदिर में चोरी हो गई, भगवान के सारे गहने चले गए ।'
 " अरे दादी , चोरों को भी और कोई नहीं मिला,चोरी भी की तो भगवान के गहनों की...बेवकूफ कहीं के,अब तो वह जरूर पकड़े जाएगे ।'
 दादी ने चौंक कर पूछा --"वो कैसे ?'
 " आप ही तो कहती हैं कि गलत काम नहीं करना चाहिए,भगवान सब देखता है.अपने गहने चोरी होते समय भगवान ने चोरों को नहीं देखा होगा क्या ?'
 "हाँ भगवान सब देखता तो है पर बोल तो नहीं सकता ।'

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Friday, January 6, 2017

दारू की खातिर


लघु कथा
            

                         दारू की खातिर
                                                                
                                                                      पवित्रा अग्रवाल

        पति ने कहा  "सुनो अपना पुराना रिक्शे वाला आया है।'
 "अपना कौन सा रिक्शे वाला  था ?'
 "अरे अपने से मेरा मतलब है जो पहले अपने गोदाम में कूलर की घास देने आता था... क्या नाम था उसका,मैं तो भूल गया ।'
 "अच्छा,वह बूढ़ा सा रिक्शे वाला...कनकय्या नाम था उसका,वो  ढ़ंग से चल तो पाता नहीं है..वह कैसे आ गया...क्या माल ले कर आया है ?'
  "नहीं, उसकी जगह अब जो माल लाता है न उसके साथ आगया है।..देखो क्या हालत बना रखी है।शर्ट भी कितनी फटी हुई पहन रखी है ..सुनो कुछ माँगे तो उसे रुपये मत देना, कुछ खाने को हो तो दे देना और मेरी कोई शर्ट दे देना ।'
 मैंने पूरी आस्तीन की एक अच्छी सी शर्ट उसे दी थी।
दूसरे दिन घास लेकर रिक्शे वाला फिर आया था,उसने वही शर्ट पहन रखी थी जो मैंने कनकय्या को दी थी।
  मैंने कहा --  "यह शर्ट तो मैंने कनकय्या को दी थी ।'
 "हाँ अम्मा उसे दारू की बुरी लत है,दारू की खातिर वो ये शर्ट हमको बीस रुपये में बेच दिया।'

       
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Tuesday, December 20, 2016

काहे का मरद

लघु कथा            
                   काहे का मरद

                                                 - पवित्रा अग्रवाल  
 
       कामवाली के घर मे घुसते ही मै ने कहा-"कमलम्मा तुम आज सात दिन बाद आई हो इतनी बार कहा है कि जब डुम्मा मारना हो तो बता दिया करो......अरे तुम्हें क्या हुआ माथे पर ये चोट कैसे लगी ? किसी ने मारा क्या ?'
   "अम्मा हमें और कौन मारेगा ?....हमारी किस्मत में तो अपने मरद से ही मार खाना लिखा।'
   "दारू के लिए फिर पैसे मॉग रहा था ?'
   "दारू के लिए पैसे न देने पर मार खाना तो हमारे लिए कोई नई बात नही अम्मा लेकिन अब वो हमें ये भी बताने लगा कि हम किस घर में काम करें किस घर का छोड दें।'
  "मतलब ?'
  "परसों हम जो नया घर पकड़े न बोलता वो काम नको कर।'
  "वहॉ से तो तुम्हें अच्छी पगार मिल रही है....छोडने को क्यों कह रहा है ?'
    "बोलता वे लोगॉ हम से छोटी जात के हैं....उनका काम नको कर ...हमारी जात वाले लोगॉ फजीता करते ।'
  " उसको कैसे पता लगा कि वो छोटी जाति के हैं ?'
 "अरे अम्मा दूर बैठ के भी दुनियॉ भर की खबर रखता ...हम सब काम वाले एक ही इलाके मे रहते...हमारे साथ वाली कोई बोल दी होगी।'
  " फिर क्या हुआ ?'
  " हम बोले वो अम्मा महीने का हजार देती। तू हम को हर महीना हजार ला के दे तो वो काम छोड देती....बस इसी बात पर बोत मारा अम्मा।'
   "फिर काम छोड दिया तुमने ?'
    "नको अम्मा ..बडी मुश्किल से अच्छा काम मिलता ....एसे छोडने लगी तो पेट को रोटी कौन डालता ? ...जहॉ अच्छी पगार मिले वहॉ काम करती ।अब तक बोत मार खायी,अब मार के देखे ..हाथॉ तोड देती।वैसे भी हम वो घर छोड दिये। हमारे अम्मा,अन्ना(भाइ )यहॉ नजदीक ही रहते ...अभी उनके साथ रह रई।

    
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पवित्रा अग्रवाल
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Thursday, November 17, 2016

रानी झाँसी अवार्ड


  लघु कथा                      
रानी झाँसी अवार्ड                     

                           पवित्रा  अग्रवाल


 "मैडम आपका नाम रानी झाँसी अवार्ड के लिए चुना गया है ।'
      "झाँसी की रानी तो अपनी वीरता व साहस के लिए याद की जाती हैं,पर मैं ने तो ऐसा कोई वीरता भरा  कारनामा किया नहीं है,...मुझे क्यों ?'
     "आप को अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में जागृति पैदा करने के प्रयास के आधार पर चुना गया है।'
      "अवार्ड  में क्या होता  है ?'
      "एक बड़ा सा मोमेन्टो, प्रमाण- पत्र के साथ एक भव्य समारोह  में किसी मंत्री के हाथों प्रदान किया  जाएगा ।'
      " कितनी महिलाओं को दिया जा रहा है ?'
      "अलग अलग क्षेत्र की बीस महिलाओं को दिया जाएगा ।'
      "इस अवार्ड के बदले मुझे क्या करना होगा ?'
      "कुछ खास नहीं बस हम एक पत्रिका प्रकाशित करते हैं उस के लिए एक दो  हजार रुपये का विज्ञापन दे दें।'
 
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Sunday, October 16, 2016

दुश्मनी

  लघु कथा
               दुश्मनी
                      
                               पवित्रा अग्रवाल


  ‘रामू ,तू तो काम पर गया था ,इतनी जल्दी कैसे आगया ?...आज तेरी छुट्टी है क्या ? ’
  ‘नहीं अम्मा ,सेठ ने काम से निकाल दिया .’
तू तो बोलता है कि सेठ तेरे काम से बहुत खुश हैं ...फिर क्यों निकल दिया ? ’
  'हाँ यह सच है पर सरकार ने बाल मजदूरी पर रोक लगा दी है .अब जो बच्चों से काम कराता हुआ पाया जायेगा उसे पुलिस पकड़ कर ले जाएगी .’
  'फिर तो तेरे भाई की भी नौकरी चली गई होगी...वो नहीं आया ? ’
'अभी आ रहा होगा अम्मा .’
   ‘अब घर का खर्चा कैसे चलेगा बेटा ...मेरी पगार तो घर के किराये में ही चली जाती है .हम गरीबों के बच्चे काम नहीं करेंगे तो क्या करेगे ?...खाली रह कर आवारागर्दी करेगे ’
   'अम्मा वह बच्चों को स्कूल भेजने को बोल रहे हैं .वहां फीस नहीं लगेगी और दोपहर का खाना भी मिलेगा ’
   'स्कूल जाना अच्छी बात है पर एक समय खाना दिया भी तो उससे क्या होगा . स्कूल का समय सुबह या शाम का एसा होना चाहिए कि बच्चे तीन चार घंटे काम भी कर सकें और पढाई भी ’
   'हाँ अम्मा एसा होता तो बहुत अच्छा होता पर ...’
‘तू और तेरा भाई काम के बहाने कूलर बनाने का एक हुनर भी तो सीख रहे थे ’
‘हाँ अम्मा पर अब क्या होगा ?’
   तभी टी वी के एक सीरियल पर उसकी नजर पड़ी जिस में बहुत से बच्चे काम कर रहे थे .उसे देख कर माँ ने आह भरते हुए कहा –‘टी वी पर रोज ऐसे बहुत से कार्यक्रम आते हैं जिसमे तुम से भी छोटे बच्चे काम करते हैं .सुना है यह बच्चे काम करने के लिए अपना गाँव ,शहर छोड़ कर बंबई में रह रहे हैं ‘
   ‘अम्मा सुना है इनको बहुत रूपया भी मिलता है ’  
‘हाँ एक बार मालकिन भी यही कह रही थीं पर सरकार इनको तो काम करने से नहीं रोकती ...जाने हम गरीबों से ही उन्हें क्या दुश्मनी है ? जाओ बेटा ,अभी तो तुम घर जाओ ...मैं काम ख़त्म करके आती हूँ ’

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Thursday, September 29, 2016


 लघु कथा                    
                बयार

                         पवित्रा अग्रवाल

   बेटे के घर पुत्री पैदा हुई थी. बेटा बहू कुछ उदास थे.उसी शहर में अपने पति के साथ अलग रह रही माँ  को पता चला तो वह मिठाई का डिब्बा लेकर अस्पताल पहुंची और दादी बनने की ख़ुशी में  नर्सों, मिलने आने वालों को मिठाई खिलाई .

माँ की इस हरकत पर बेटे बहू को बहुत गुस्सा आया.

माँ हमारे बेटा नहीं बेटी हुई है

हाँ मुझे मालूम है लक्ष्मी आई है.

    ‘माँ , माता पिता से अधिक दादा दादी को पोते की चाह होती है और तुम पोती के आने की ख़ुशी में लड्डू बाँट रही हो

बेटा पहली बात तो मुझे बेटियां भी उतनी ही प्यारी है जितने बेटे .वैसे भी मैं ने बेटी का सुख कहाँ जाना है. भगवान ने बेटी दी ही नहीं और तू भी उदास मत हो समय बदल रहा है , आज बेटियां भी किसी से कम नहीं हैं

‘  फिर भी ...

  फिर भी क्या बेटा ?... आज कल बहुत से घरों में बेटे के घर माता पिता को प्रवेश नहीं मिलता ,बेटी के घर में फिर भी थोड़ी पूछ हो जाती है .अपनी सास को ही देख लो उनको तुम लोग जितनी इज्जत देते हो उनका बेटा कहाँ देता है ?..तो बेटा जैसी चले बयार पीठ तब तैसी दीजे .

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