Wednesday, May 23, 2012

 लघु कथा
                        टी आर पी का चक्कर
                                                                पवित्रा अग्रवाल
 नन्दा ने टी. वी. खोला और खटाक से बन्द करते हुए बोली --" न्यूज चैनल वाले तो लगता है पागल हो गए हैं,कुछ और दिखाने को जैसे इनके पास है ही नहीं ।'
 "ऐसा क्यों कह रही हो ?'
 "तो और क्या कहूँ ?एक प्रोग्राम में गेर ने शिल्पा को चूम क्या लिया ,बस न्यूज में विस्तार से वही दिन में कई कई बार दिखाने का उन्हें मौका मिल गया ।'
 "लेकिन शिल्पा को देखो उसे तो कुछ भी गलत नहीं लग रहा बल्कि वह तो गेर की वकालत कर रही है कि गेर ने ऐसा भी क्या कर दिया जो भारतीय संस्कृति के नाम पर बवाल  मचाया जा रहा है।  वह एक अच्छे कॉज के लिए यहाँ आया है... हमें उस की कदर करनी चाहिए ..हाँ वह  थोड़ा वह बहक गए थे पर  हमारी संस्कृति में तो अतिथि देवो भव भी कहा गया है'...... क्या यह सब सही तर्क हैं  ?'
 "तुम बिलकुल सही कह रहे हो पर अभी मैं बात शिल्पा और गेर के सही या गलत होने की नहीं कर रही हूँ  । बात न्यूज चैनल्स की नीयत की कर रही  हूँ ।'
 "मैं समझा नहीं तुम क्या कहना चाहती हो ?'
 "मैं कहना चाहती हूँ कि गेर ने शिल्पा को एक बार चूमा ,उसे कितने प्रतिशत लोगों ने देखा होगा ? किन्तु चैनल्स अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिए उस सीन को दिन में पचासों बार दिखा रहे है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग देखें ...क्या वह सीन बार बार दिखाए बिना न्यूज नहीं बन सकती ?'
 "सो तो है सब उसे भुनाने में लगे हैं ।''

-पवित्रा अग्रवाल

Monday, April 16, 2012

अय्याशी के अड्डे

    लघु कथा   

                        अय्याशी के अड्डे

                                                                              देवर प्रमोद मिठाई ले कर आए थे ...उनका चेहरा खुशी से दमक रहा था।
 "काहे की मिठाई है ?'
 "अरे भाभी जी तन्वी को बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है ।'
 "कहाँ ?'
 "डैल में ,..शुरू मे ही पंद्रह हजार देंगे ।'
 "अच्छा,बहुत खुशी हुई सुन कर...बधाई ।कौल सेंटर में लगी है क्या ?'
 "हाँ '
 ."रात की ड्यूटी  रहेगी ?'
 "हाँ ड्यूटी तो रात की ही रहेगी...पर डर की कोई बात नहीं है। कंपनी की गाड़ी लेने व छोड़ने आएगी ।'
 "वो तो सभी कॉल सेंन्टर्स में यह व्यवस्था रहती है ।' कहते हुए मुझे तीन चार वर्ष पुरानी बात याद आ गई ।मेरी सहेली की बेटी को काल सेंटर में नौकरी मिली थी..मैं ने यह बात जब अपने इन्हीं देवर प्रमोद को बताई तो वह बुरा सा मुंह बना कर बोले थे--" अरे भाभी जी काल सैंटर तो अय्याशी के अड्डे होते हैं।'
 "अय्याशी के अड्डे ' शब्द सुन का मेरा मन आहत हुआ था ,मैं ने एक तरह से उसे डपटते हुए कहा था --"तुमने भी यह क्या घटिया शब्द स्तेमाल किया है।''
 "अरे भाभी जी आपकी बेटी तो काल सेंटर में नहीं है, आपको इतना बुरा क्यों लग रहा है ?'
 "मेरी बेटी न सही पर दूसरों की बेटियाँ तो वहाँ काम करती हैं ,इस तरह का कमेंन्ट करना अच्छी बात नहीं हैं। 
 "अरे भाभी जी आप नहीं जानती बाहर क्या क्या हो रहा है ।'
 मैं किसी बहस में नहीं उलझना चाहती थी अत: बात समाप्त करते हुए  कहा --" मैं तो बस इतना  जानती हूँ कि अच्छे बुरे लोग सब जगह होते हैं पर इस तरह की टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है।'
 आज वही प्रमोद अपनी बेटी के काल सेंन्टर में काम मिलने की खुशी में मिठाई बाँट रहे हैं ।मन कर रहा था उनसे पूछूँ कि काल सेंटर जब इतने खराब होते हैं तो अपनी बेटी को उसमें काम करने क्यों भेज रहे हैं ?'

                                                                        पवित्रा अग्रवाल 
    
पवित्रा अग्रवाल

Friday, March 2, 2012

अगर-मगर घर ना तोड़ो

लघु  कथा
     
                                    
                                      अगर-मगर         
 
                                                                                  पवित्रा अग्रवाल
 "साब आज मुझे छुट्टी होना।'
 "क्यों,कुछ काम है ?'
 "हौ साब, बीबी पेट से है, अभी उस को जच्चगी के लिये दवाखाने में शरीक करा के आया हूँ।'
 "तुम को कितने बच्चे हैं ?'
 "ये तीसरा है साब।'
 "तुम्हारी शादी को कितने दिन हो गये ?'
 "अगले महीने तीन बरस हो जाते ।'
 "तीन बरस में तीन बच्चे ! अब आगे क्या सोचा है ?'
 "साब अल्ला के करम से बेटा भी है और बेटी भी।...मैं तो पिछली बार ही बीबी का आपरेशन कराने  की  सोचा था मगर अम्मी अब्बा नहीं कराने दिये और अब भी नको बोल रऐ।'
 "तुम कितने बहन भाई हो ?'
 "हम दस हैं साब ।'
 "सब पढ़ लिख के अच्छे रोजगार में लगे हैं ?'
 "हमारे अब्बा दर्जी का काम करते हैं ,खाने को ही ठीक से नहीं जुटा पाते थे अच्छी तालीम कहाँ से   देते,सब दो-चार क्लास पढ़े हैं, मै ही बारह क्लास तक पढ़ लिया बस।'
 "अब तुम तो कुछ सोचो, क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे बच्चों की परवरिश तुम से बेहतर तरीके से हो ?' 

" चाहता तो हूँ मगर घर वाले......'
 "देखों ये अगर मगर छोड़ो और कुछ फैसले अपने आप लेना सीखो ।'
 "शुक्रिया साब,आप सही समय पर मशवरा दिये ...इस बार मैं बीबी का आपरेशन भी करा देता ।'
        
लघु कथा        
                 
                           
             घर ना तोड़ो 
                                            पवित्रा अग्रवाल     मैंने माली से कहा-"बालय्या देखो गार्डन में कुछ  पेड़ बड़े होकर बहुत फैल गये हैं..जब भी तेज हवा चलती है उन से उलझ कर टेलीफोन के वायर टूट जाते हैं..फिर फोन ठीक होने में पाँच-सात दिन लग जाते हैं।..इस बीच बहुत परेशानी होती है।...इन पर बैठ कर कबूतर भी बहुत गंदगी फैला रहे हैं।तुम देखो लॉन की घास को कितना गंदा कर दिया है।तुम आज सब से पहले तो टेलीफोन वायर के आसपास की और लॉन के उपर की कुछ शाखाएं काट दो।'
      माली ने पेड़ पर एक नजर डाली और बोला-"अम्मा झाड़ पर बहुत सी चिड़ियों के घराँ हैं..उसमें उनके के अंड़े और बच्चे भी होंयेंगे...कटिंग किये तो उन के घराँ टूट कर गिर जाते...अम्मा रहने दो न उनको बेघर किये तो पाप लगता ।'
   माली की बात सुन कर मुझे एक झटका सा लगा।चिड़ियों का घर टूटने और उनके बेघर होने की उसे इतनी चिंता है।..अभी कुछ दिन पहले ही जब उसने अपने बीबी - बच्चों को बेघर कर के दूसरी औरत को घर मे बैठाया था तब उसे अपने घर के टूटने का ख्याल एक बार भी नही आया ।  
       
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-पवित्रा अग्रवाल
 

Sunday, February 5, 2012

मजबूरी

   लघु कथा 

                                  मजबूरी
                                        पवित्रा  अग्रवाल                                  
           फूला ने नंदा से कहा-"भाभी जी आपके घर में पार्वती काम करती है न...आपको मालुम है वह कौन जात है ?'
        "नहीं'
       "वह जाति से महतर है।'
       अन्दर काम कर रही पार्वती यह बात सुन कर बाहर भागती हुई आई। उसे देखते ही फूला एक दम से सकपका गई।
        पार्वती आक्रामक स्वर मे बोली -"फूला यदि मै महतर हूँ तो तू ही कौन सी बनियां या  बामन  है ?...तू भी तो चमारिन है।'
       "हाँ मै चमार हूँ लेकिन अपनी जाति छिपा कर काम नही करती।तुझ से पहले मैं ही यहाँ काम करती थी।पूछ ले भाभी जी से मै ने काम शुरू करने से पहले ही अपनी जाति बता दी थी। वो तो मै बीमारी के कारण एक महीना काम पर नही आ पायी तो भाभी जी ने तुझे रख लिया।'
       "जाति तो मैं ने भी ना छिपाई है। भाभी जी ने पूछा नही ,मैं ने बताई नहीं । यदि पूछतीं   तो  मैं झूठ थोड़े ही बोलती ।...मै जाति से भले ही मेहतर हूँ पर मेरे घर मे मेहतर का काम कोई भी नही करता। मेरा आदमी तो कम्पाउडर  है फिर भी मैं यहाँ आकर पहले साबुन से हाथ-पैर धोती हूँ तब काम करती हूँ । '
       नंदा सोच रही थी शहर मे आजकल कामवालियों की इतनी किल्लत है कि मिलती ही नहीं और मुझ से काम होता नही।...काम कराना अपनी मजबूरी है...फिर जाति पूछ के क्या फायदा ?...फूला और पार्वती को बहस मे उलझा देख कर नन्दा ने कहा - "पार्वती देख मैं तो यह जात - पात मानती नही किन्तु मेरी सास मानती हैं। वह अभी मंदिर से वापस आ रही होंगी, उन्होंने तुम्हारी बातें सुन ली तो तुझे यह काम छोड़ना पड़ेगा (और फिर सब काम मेरे सिर पड़ेगा) इसलिए जल्दी से यह बहस छोड़ कर अपने काम मे लग जा।'
 पार्वती फूला को खा जाने वाली नजरो से घूरती हुइ अंदर चली गई।


                                                             घरोंदा 
                                                   4-7-126  इसामियां बाजार
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Thursday, January 5, 2012

देश का दुश्मन

लघु कथा      

                         देश का दुश्मन
                                                                           पवित्रा अग्रवाल   

    किशोर वय के बच्चे ने अपनी मम्मी से पूछा -- "मम्मी मैं ने सुना हे पापा किसी आतंकवादी की   तरफ से मुकद्दमा  लड़ कर उस को बचाने का प्रयास कर रहे हैं ?'
 "अच्छा ?'
 "आपको नहीं पता ? '
 "मुझे क्या पता ...मुझे बता कर वह  मुकद्दमा  लड़ते हैं क्या ?'
 "पर मुझे पता है, वह देश में आंतक फैलाने वाले एक मुजरिम का केस लड़ रहे हैं ।'
 "हो सकता है ।'
 "पर क्यो मम्मी ?...हमारे देश में आतंक फैला कर सैंकड़ों की जान लेने वाले को पुलिस बड़ी   मुश्किल से दूसरे देश से पकड़ कर लाइ है,उसके बचाव में केस लड़ना क्या गलत नहीं ?'
 "बेटा वकीलों का तो काम ही ये होता है,जिसके वकील होते हैं उसे बचाने का प्रयास करते हैं,भले ही  वह दोषी हो।'
 "मम्मी ये तर्क मेरे गले नहीं उतर रहा है। मेरी समझ में एक देशद्रोही को सजा से बचाने वाले को    देश प्रेमी तो नहीं कहा जा सकता ।'

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Wednesday, November 30, 2011

प्यार पर प्रश्न चिन्ह

   लघु कथा        




                      प्यार पर प्रश्न चिन्ह 


                                                                                
                                                                पवित्रा अग्रवाल





 पत्नी ने पति से पूछा ---
 "सुनो तुम कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ के पास, तुम्हें चलना है तो तुम भी चलो ।'
 "ना मुझे तो नहीं जाना पर तुम क्यों जा रहे हो ?'
 "क्यों का क्या मतलब है ।...तुम भी तो अपनी माँ के पास जाती हो ? अपनी माँ से
मिलने का मेरा मन  नहीं करता क्या ?'
 "वह तो आपको जरा भी प्यार नहीं करतीं बल्कि आपकी बुराई ही करती हैं।'
 "किस से करती हैं मेरी बुराई ?'
 "मुझ से भी करती हैं।' 
"तुम भी तो मेरी शिकायत उनसे करती हो... क्या मैं भी तुम्हारे पास आना छोड़ दूँ ?'
 "मैं ने तो तुम्हारी शिकायत कभी उनसे नहीं की ?'
 "उनको छोड़ो अपने बेटे राहुल की शिकायत तुम मुझ से और मेरी शिकायत राहुल से
नहीं करतीं हो ? तो  क्या मैं यह मान लूँ कि तुम हम दोनों को प्यार नहीं करती  ?....क्या
मैं और राहुल भी तुम्हारे पास   आना छोड़ दें ?'
 "तुम तो बात को कहाँ से से कहाँ मोड़ देते हो। बात का बतंगड़ बनाना तो कोइ तुम से
सीखे ।'
 "यह भी मैं ने तुम से ही सीखा है।...माँ से मिलने जाने की बात सुनते ही तुमने उनके
प्यार पर ही प्रश्न   चिन्ह लगा दिया।'




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Monday, November 14, 2011

तूने क्या दिया

लघु कथा                                             

                                            तूने क्या दिया
                                                    
                                                                                      पवित्रा अग्रवाल                                                   
          


               लालची स्वभाव की शगुन अक्सर अपने पति को ताने देती रहती थी ।हमेशा उसके निशाने पर  होते थे उसके ससुराल वाले ।
 पति के घर में घुसते ही बोली -- "आज मेरी सहेली के बेटे का नामकरण संस्कार हुआ है ।पता है उसकी सास ने बच्चे को क्या दिया ?'
 "मैं सुबह का गया अभी आफिस से लौटा हूँ ।यह सब मुझे कैसे पता होगा ?'
 "मैं बता रही हूँ न...उसकी सास ने बच्चे को दो तोले की सोने की चेन दी है ।वह मुझ से पूछ रही थी कि तेरे बेटे के जन्म पर तेरी सास ने क्या दिया था ?'
 "तूने क्या कहा ?'
 "क्या कहती ...दिया तो उन्हों ने एक सोने का छल्ला भी नहीं था पर अपनी इज्जत रखने के लिये झूठ बोलना पड़ा कि उन्होंने भी सोने की चेन दी थी ।'
 "तेरी सहेलियाँ हमेशा यह तो पूछती हैं कि सास ने क्या दिया , नन्द ने क्या दिया ।...कभी यह नहीं पूछती कि तूने अपनी सास और नन्द को क्या क्या दिया ?' 



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