Thursday, April 9, 2015

जो राम रचि राखा

लघु कथा
                     जो राम रचि राखा
 
                                                    
                                                                            पवित्रा अग्रवाल

 "बेटा यह शादी नहीं हो सकती ।'
 "क्यों पापा ? वह हमारी जाति की नहीं है,इस लिए ?'
 "एक कारण यह भी हो सकता था पर तुम्हारी खुशी के लिए हम इस शादी के लिए तैयार हो गए थे। पर तुम दोनो की जन्म पत्री नहीं मिल रही है।पंडित जी ने कहा है कि लड़की के भाग्य में वैधव्य का योग है... इसलिए उन्होंने इस विवाह से इंकार कर दिया है और यह बात सुन कर  हम भी हाँ कैसे  कर सकते ?'
 "पापा हमारा पढ़ा लिखा परिवार है... इन दकियानूसी बातों पर आप विश्वास  करते हैं ?
 "हाँ बेटा इस में तो हम विश्वास  करते हैं।'
 पापा यदि ये पंडित ऐसे किस्मत पढ़ सकते तो इनके परिवार में   कोई बेटी या बहू विधवा नहीं होती। ...  आपको तो पता है न कि पिछले वर्ष ही इन पंडित जी की बेटी शादी के एक साल बाद ही विधवा हो गई थी।क्या इन्होंने कुंडली नहीं मिलाई होगी ?'
 "बेटा तू बहस बहुत करता है।'
 "पापा मैं बहस नहीं कर रहा, सच्चाई के उदाहरण दे कर आप को ऐसे बेतुके अंधविश्वासों  से बचाने की   कोशिश कर रहा हूँ। ...प्लीज पापा ।'
 "ठीक है बेटा दिल पर पत्थर रख कर स्वंय को यह कह कर समझा लेंगे कि होवत वही जो राम रचि राखा ।'
 " थैंक यू,यह हुई न मेरे पापा वाली बात '

-पवित्रा अग्रवाल

ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com

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4 comments:

  1. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-04-2015) को "अरमान एक हँसी सौ अफ़साने" {चर्चा - 1943} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी .

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