Thursday, April 14, 2016

नाटक

 लघु कथा     
          नाटक
 
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

‘बहू कल के लिए चने भिगो दिए ? पूजन की दूसरी तैय्यारी भी करनी है ... .किन किन कन्याओं को बुलाना है उनको भी खबर कर दे .’...

बहू सब समझ गई थी फिर भी अनजान बन कर बोली –‘ कल क्या है माँ जी ?’
“अरे भूल गई ,कल कुंवारी कन्याओं को जिमाँने को बुलाना है ,उनका पूजन करना है ’
“नहीं माँजी यह त्यौहार अब मैं कभी नहीं करूंगी ’
क्यों ?
‘आप भूल सकती हैं , मैं नहीं .अपनी बेटी को कोख में मार दो और दूसरों की बेटियों को बुला कर पूजा करो ...सॉरी माँ अब यह नाटक मुझ से न होगा '
 

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