Wednesday, June 7, 2017

दिखावा


लघु कथा
                             दिखावा
                                                        पवित्रा अग्रवाल


             नीना  बीमार बहन को देखने के लिये अपने बच्चों को  सहेली के पास छोड़ कर बहुत लम्बा सफर तय कर के आई थी ।जीजा जी चिड़ कर बोले यहाँ सब दिखावा करने आते हैं,आई हैं तो यहाँ रुकिये ,काम में कुछ मदद कीजिए,वाशिंग मशीन में कपड़े पड़े हैं उन्हे धोइये ऐसे आने से क्या फायदा ।'
             आज मेरी बहन बेहोशी की हालत में है तो आप बात करने की भी तमीज भी भूल गए,..आप तो मुझे बहुत थैंक लैस आदमी लगते हैं।  मैं न सही यहाँ रहने वाले मेरे सभी भाइ बहन तन मन धन से आपके साथ लगे हैं और आप इस तरह की बात कर रहे हैं...हमारा दुख, हमारा आना आप को दिखावा लग रहा है।।चलिए यही सही मैं तो दिखावा करने ही आई हूँ किन्तु आपके घरवाले तो सौ-दो सौ किलो मीटर की दूरी पर ही रहते हैं,वह तो एक बार  दिखावा करने भी नहीं आए।'
       "क्या आयें इन्होंने किसी से बना कर ही नहीं रखी ।'
       "इसने न सही आपने तो बना कर रखी थी, आपकी पत्नी मृत्यु शैया पर है इस से बड़ा दुख आप पर और क्या पड़ेगा ...पर आप के दुख में भी कोई झांकने नहीं आया और बात करते हैं हमारे दिखावे की ।'

-- email -agarwalpavitra78@gmail.com

-पवित्रा अग्रवाल
 

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Tuesday, May 23, 2017

समधी - समधन का कमरा

लघु कथा
                     समधी - समधन का कमरा

         
                                               पवित्रा अग्रवाल

             "माँ मुझे औरों से पता लगा कि आप बीमार हैं,क्या मैं इतना पराया हो गया कि आपने मुझे अपनी बीमारी की खबर भी नहीं दी ?''
              "बेटा तू अपने घर परिवार में खुश है...तुझे फोन कर के हम अशान्त नहीं करना चाहते थे...एक ही शहर में रहते हुए तुझे कितने दिन बाद  देखा है ...फोन करने का भी तुम्हारे पास समय नहीं है ।''
     "माँ वो मकान बन रहा है न उसमें व्यस्त था...बस इसी लिए नहीं आ पाया ।''
 "तू मकान बनवा रहा है ?...बेटा एक काम जरूर करना....उसमें एक कमरा अपने समधियों के लिए जरूर बनवाना....हमारी जैसी बेवकूफी मत करना जिसने इतनी दूर की नहीं सोची थी।''
       "आप ऐसा क्यों कह रही हैं माँ ?.... बबलू तो अभी बहुत छोटा है।''
 "तू इसी लिए तो हम से अलग हुआ कि इस मकान में बहू के माँ बाप के रहने के लिए जगह नहीं थी ."

ईमेल -- agarwalpavitra78@gmail.com

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Friday, August 19, 2011

चित भी उनकी और पट भी

लघु कथा                                     
     
                               चित भी उनकी और पट भी

                                                                                                                 पवित्रा अग्रवाल
     

     र पंहुचते ही पत्नी ने पूछा -- " सुनो शास्त्री जी के पास हो आए ?''
     "हाँ ''
  "आपने बताया कि उनके हिसाब से बनवाए  इस नए मकान में रहते हुए करीब दो वर्ष हो गए हैं पर परेशानियां रूप बदल बदल कर आ रही हैं, हम सुखी नहीं हैं ।... इस से ज्यादा सुखी तो हम पहले के मकान में थे जिसमें उन्हों ने वास्तु के हिसाब से बहुत से दोष गिना दिए थे।"
 "हाँ मैं ने सब बताया कि इस घर में आने के बाद छोटे बेटे की नौकरी चली गई ।बड़ी बहू का एबोर्शन हो गया।...घर में अशान्ति रहने लगी है ...मेरा व्यापार भी अच्छा नहीं चल रहा है ,घर के खर्चे भी नहीं निकल रहे हैं।''
 "क्या कहा उन्होंने ?''
 "अब क्या कहेंगे ....इन लोगों के पास हर बात का जवाब होता है...कहने लगे -- "देखिए मैं ने आपका घर पूरी तरह से वास्तु के हिसाब से बनवाया है पर आपके पड़ौस के वास्तु का,आपके काम करने की जगह के वास्तु का भी जीवन पर प्रभाव पड़ता है...यह सब परेशानियां उसी की वजह से आ रही हैं।''
 मैं ने कहा -- "शास्त्री जी इस घर के सिवाय कुछ भी नहीं बदला है।मेरा व्यापार, बच्चों का आफिस सब पुरानी जगहों पर ही है।''
 रूखे स्वर में चिढ़ कर बोले --" तो आपके पड़ौस का वास्तु प्रभावित कर रहा होगा ...उसे मैं कैसे रोक सकता हूँ।''

                                                                                  


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